सनातन धर्म में भगवान श्री गणेश का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय है। उन्हें विघ्नहर्ता, सिद्धिविनायक, बुद्धि के देवता तथा प्रथम पूज्य के रूप में जाना जाता है। भारत में किसी भी शुभ कार्य, व्रत, उपवास, यज्ञ, विवाह, गृहप्रवेश या धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ भगवान गणेश के स्मरण से ही किया जाता है।
शास्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि गणेश जी का स्मरण किए बिना कोई भी कार्य पूर्ण फलदायक नहीं माना जाता। वे केवल विघ्नों को दूर करने वाले देवता ही नहीं, बल्कि जीवन में बुद्धि, विवेक और सिद्धि प्रदान करने वाले आराध्य देव हैं।
इसी कारण प्रत्येक भक्त के जीवन में भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है।
भगवान श्री गणेश प्रथम पूज्य हैं
भगवान श्री गणेश प्रथम पूज्य हैं। गणेश जी प्रथम पूज्य होने के साथ-साथ अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता भी हैं। भारत में अधिकांश लोग भगवान गणेश जी की पूजा-अर्चना करते हैं।
किसी भी व्रत-उपवास या किसी भी प्रकार की पूजा संपन्न करने से पहले भगवान गणेश जी की सर्वप्रथम पूजा करना अत्यंत फलदायक माना गया है।
भगवान गणेश जी का जन्म प्रसंग
भगवान श्री गणेश के पिता भगवान शंकर हैं और माता पार्वती जी हैं। उनके जन्म की कथा भी आप भली-भांति जानते हैं कि भगवान श्री गणेश जी का जन्म कैसे हुआ था।
माता पार्वती जी ने अपने शरीर पर लगाए गए हल्दी-चंदन के उबटन से भगवान गणेश जी की प्रतिमा बनाई और उसमें अपनी दिव्य शक्तियों से प्राण स्थापित कर गणेश जी को उत्पन्न किया।
माता पार्वती जी को पुत्र प्राप्त करने की इच्छा हुई। तब उन्होंने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की और उनसे पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने गणेश जी के रूप में अवतार लिया।
भगवान विष्णु, भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं और उन्होंने भगवान शिव की भक्ति करने के लिए गणेश जी का अवतार लिया। जिस प्रकार भगवान शिव के आराध्य देव भगवान विष्णु हैं, उसी प्रकार भगवान विष्णु के आराध्य देव भगवान शंकर हैं।
भगवान गणेश जी को प्रथम पूज्य माना जाता है। भगवान गणेश जी और भगवान शिव के बीच जो युद्ध हुआ था, उसके पीछे भी भगवान की लीला ही थी।
भगवान शिव ने भगवान गणेश जी का मस्तक काट दिया था और बाद में उन्हें गजानन नाम देकर तथा प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद प्रदान किया।
भगवान गणेश जी की पूजा कैसे करें
दोस्तों, यदि आप किसी भी भगवान की पूजा करते हैं, तो भगवान गणेश जी का सर्वप्रथम नाम लेना चाहिए और सबसे पहले उनकी पूजा करनी चाहिए।
भगवान सूर्य को भी जल देने से पूर्व भगवान गणेश जी का नाम लेना अत्यंत आवश्यक माना गया है। यदि हम भगवान गणेश जी का नाम नहीं लेते हैं, तो हमारे कार्य शीघ्र सफल नहीं होते। किसी भी भगवान की पूजा करने से पूर्व भगवान गणेश जी का नाम अवश्य लेना चाहिए।
कई बार ऐसा होता है कि हम अपने इष्ट देव की बहुत श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं, परंतु हमें फल की प्राप्ति नहीं होती। इसका कारण यह है कि यदि आप पूजा का फल प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको सबसे पहले गणेश जी की पूजा करनी चाहिए या गणेश जी का नाम लेकर
श्री गणेशाय नमः
या
ॐ गं गणपतये नमः
मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
इसके बाद आप अपने इष्ट देव की पूजा-अर्चना करें। जो भी आपके इष्ट देव हैं, वे भगवान आप पर शीघ्र कृपा करेंगे और आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करेंगे।
गणेश जी को तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती
दोस्तों, गणेश जी को तुलसी अर्पित नहीं की जाती। इसके पीछे एक बहुत ही सुंदर कथा प्रचलित है। इसलिए गणेश जी को भोग लगाते समय उनके प्रसाद में तुलसी नहीं डालनी चाहिए।
मूर्ति स्थापना का महत्व
भगवान गणेश जी की पीतल या अष्टधातु की मूर्ति किसी भी चतुर्थी के दिन लाकर उसकी पूजा-अर्चना करना अत्यंत शुभ माना गया है। भगवान गणेश जी की पूजा प्रतिदिन करनी चाहिए।
संकटनाशन गणेश स्तोत्र
भगवान गणेश जी के संकटनाशन स्तोत्र का पाठ अत्यंत फलदायक माना गया है। इसमें भगवान गणेश जी के बारह नामों का वर्णन है। इसका पाठ करने से आपके सभी दुख समाप्त हो जाते हैं और सारे संकट दूर हो जाते हैं। इसे पढ़ने में केवल एक मिनट का समय लगता है।
चार श्लोकों में गणेश जी के बारह नाम दिए गए हैं। यदि आप इन चार श्लोकों का पाठ करते हैं, तो आपके कष्ट धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं।
।। प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुःकामार्थसिद्धये ॥1॥
।। प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥2॥
।। लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥3॥
।। नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥4॥
।। द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥5॥
।। विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥6॥
।। जपेन्नित्यं गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलम् लभेत् ।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥7॥
।। अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥8॥
गणेश चतुर्थी के नियम
गणेश चतुर्थी पर यदि आपके पास गणेश जी की पीतल या अष्टधातु की मूर्ति है, तो आपको मिट्टी की दूसरी मूर्ति खरीदने की आवश्यकता नहीं है।
आप केवल पीतल की मूर्ति की दस दिन नियमपूर्वक पूजा कर सकते हैं और घर में दसवें दिन उस मूर्ति को जल से स्पर्श कराकर पुनः पूजा में स्थापित कर सकते हैं।
यदि आप मिट्टी की मूर्ति खरीदते हैं, तो उसका विसर्जन स्वच्छ स्थान पर करें। भगवान गणेश जी की मूर्ति को गंदी जगह पर विसर्जित नहीं करना चाहिए। यदि संभव हो, तो घर के गमले में ही भगवान की मूर्ति का विसर्जन करें।
भगवान गणेश जी की पूजा करते समय भगवान शिव और माता पार्वती जी का नाम भी अवश्य लेना चाहिए।
गणेश चतुर्थी पर पूजा करते समय भगवान श्री गणेश की पत्नियाँ रिद्धि-सिद्धि, उनके पुत्र शुभ-लाभ और उनकी पुत्री संतोषी माता का भी स्मरण करना चाहिए।
भगवान गणेश जी की एक माता गंगा माता को भी माना जाता है। कहा जाता है कि जब पार्वती जी ने भगवान गणेश जी को अपने शरीर के उबटन से बनाया था, तब गंगाजल से स्नान कराने पर उनमें प्राण प्रकट हुए। इसलिए भगवान गणेश जी का गंगेय नाम भी है और उन्हें गंगापुत्र भी कहा जाता है।
भगवान गणेश जी के अनेक नाम हैं और उन्होंने अनेक रूपों में अवतार लेकर राक्षसों का अंत किया। भगवान गणेश जी का वाहन मूषक है।
भगवान गणेश की पूजन सामग्री
- कच्चा दूध, गंगाजल, शहद, दही और देसी घी को मिलाकर भगवान गणेश जी का अभिषेक करें।
- ॐ गं गणपतये नमः मंत्र का जाप करते जाएँ।
- भगवान गणेश जी को जल से स्नान कराकर आसन पर विराजित करें।
- चंदन, हल्दी, कुमकुम, चावल, अबीर और गुलाल आदि से भगवान गणेश जी का पूजन करें।
- दुर्वा चढ़ाएँ।
- सिंदूर चढ़ाएँ।
- जनेऊ या कलेवा अर्पित करें।
- मोदक या बूंदी के लड्डू का भोग लगाएँ।
- पुष्प अर्पित करें और धूप-दीप से आरती करें।
- हरे रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
- गुड़ का भोग लगाएँ।
- नारियल अर्पित करें।
- कपूर या कंडे पर घी और गुड़ डालकर धूप दें।
यदि यह सामग्री उपलब्ध न हो, तो भी साधारण दीपक जलाकर श्रद्धा-भाव से पूजा की जा सकती है। मन में भगवान के प्रति विश्वास और श्रद्धा होना ही सबसे आवश्यक है।
हमारे शास्त्रों में मानस पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। यदि सामग्री उपलब्ध न हो, तो मन में ही अर्पण करने से भी फल प्राप्त होता है।
भगवान गणेश से जुड़े विशेष तथ्य
भगवान गणेश जी का जन्म बुधवार के दिन हुआ माना जाता है। उन्हें हरा और लाल रंग अत्यंत प्रिय है। भगवान गणेश जी को बुध ग्रह का देवता भी कहा जाता है और बुध ग्रह का रंग हरा होता है।
बुध ग्रह को भाग्य का कारक माना जाता है। भगवान गणेश जी की पूजा-आराधना करने से भाग्य का उदय होता है।
भगवान गणेश जी को बुद्धि के देवता भी कहा जाता है। उन्हें सिद्धिविनायक और विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है।